गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

440-जो हर रिश्ते से ऊपर होता हैं




440-जो हर रिश्ते से ऊपर होता हैं

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, July 5, 2012 at 5:12pm ·
मेरा वैसे तुमसे
कोई रिश्ता नहीं हैं
फिर भी
मैं तुम्हारे बिना
अधूरा रह जाता हूँ
तुम मेरे रोमानी मन का
वह काल्पनिक महत्वपूर्ण हिस्सा हो
जो मुझे सरस कर जाता हैं
मुझमे उत्साह और उमंग भर जाता हैं
जब भी मैं अपनी देह
अपने मन से अलग होकर
रूहानी होता हूँ
तब तुम
शब्दों की मधुर आवाज बन कर
मेरे आसपास गूंजने लगती हो
अक्षरों का बुलबुला बन
मेरी चेतना की नदी में तैरने लगती हो
तब
तुम्हारी परछाई
तुम्हारी तस्वीर से बाहर निकल कर
मेरे करीब आ जाती हैं ....
मेरे लिये तुम एक कोरा ड्राईंग शीट हो
जिस पर मैं
मनचाहे चित्र बना लिया करता हूँ
तुम मेरे अकेलेपन के एकांत में
उगे हुए वृक्ष की छाया हो
जिसके नीच बैठकर मै
चिंतन ,मनन ,किया करता हूँ
उस लगाव के लिये शीर्षक खोजा करता हूँ
जो हर रिश्ते से ऊपर होता हैं
किशोर

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