गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

438-जब शब्द नहीं होते

438-जब शब्द नहीं होते
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, July 5, 2012 at 2:39pm ·
जब शब्द नहीं होते
जब अक्षर नहीं होते
तब भी तुम होती हो
कोरे पन्नों की तरह मेरे आस पास
यादों की स्याही की तरह
मेरे भीतर नसों में भरी हुई सी
वर्षा की बूंदों की तरह
पत्तों की नोकों पर
अटकी हुई सी
बिजली के तारों पर
भींगी हुई नन्ही चिड़िया की तरह
अपनी चोंच से अपने परों कों
कुरेदती हुई सी
आसमान पर बादलों की तरह न जाने कहाँ से आ जाती हो
सड़के आईना बन जाती हैं
और तुम्हारी परछाईयाँ उभर आती हैं
मुझे लगता हैं जैसे
मै कही भी रहूँ
पर मुझे तुम तलाश लेती हो
और मुझे इसका आभास भी नहीं हो पाता हैं
अपने में खोया हुआ कभी कभी
मै तुम्हें नज़र अंदाज़ कर जाया करता हूँ
तुम लौट लौट कर आती हो
पर मै तुम्हें जाती हुई लहरों सा निहार कर
मायूस हो जाया करता हूँ अक्सर
हरी स्याही से वृक्षों पर
बहुत से ख़त लिख छोड़े हैं
गीली रेत पर
तुम अपना पद चिन्ह अंकित कर गयी हो
जब शब्द नहीं होते
जब अक्षर नहीं होते
तब भी तुम होती हो
तुम ही तो मेरी कविता हो
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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