गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

433-अनकहा कुछ शेष रह गया हैं




433-अनकहा कुछ शेष रह गया हैं

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, June 29, 2012 at 8:38am ·
अनकहा कुछ शेष रह गया हैं
जब रिश्ते नातों के
तमाम संबोधनों से
मै मुक्त   हो जाता हूँ
तब मैं सिर्फ मैं होता हूँ
इस ब्रम्हांड में नितांत अकेला
तब मैं तुमसे मिलने आता हूँ
तुम मेरी कल्पना हो
तुम्ही मेरी कविता हो
लेकिन जब
तुम कहती हो मौन रहों
मौन ..बस ..मौन
तब मुझे लगता हैं
मेरा मौन व्रत  कही टूट न जाए
क्या मेरी ख़ामोशी रूपी नदी
तुम्हारी ख़ामोशी के समुद्र तक
पहुँच जायेगी
या तुम कहना चाहती हो की ...
मैं अपने मैं से भी नाता तोड़ लूँ
उस मैं से ..जिसमे
तुम्हारे प्यार की भीनी भीनी महक हैं
जिसने तुम्हें बिना देखे ,देख लिया हैं
बिना स्पर्श किये ,छू लिया हैं
जिसने तुम्हारे गीतों कों बिना सुने गा लिया हैं
जो तुम्हारे ह्रदय कों
मीलों दूर से भी ...
अपने सीने में धडकता हुआ
महसूस करता हैं
चलों तुम कहती हो तो
शीशे के सदृश्य ...
इस पारदर्शी मैं कों
चूर चूर कर देता हूँ
लेकिन आश्चर्य ....
प्रत्येक  कण में
तुम्हारी छवि नजर आ रही हैं
क्या अब भी इस
नि;शब्द
नि;स्वर स्थिति में ...
अनकहा कुछ शेष रह गया हैं
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

1 टिप्पणी:

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत सुंदर मन के भाव ...