बुधवार, 19 दिसंबर 2012

431-तुम मेरी रूह का हो गहना



431-तुम मेरी रूह का हो गहना

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, June 28, 2012 at 2:53pm ·

हालां की
तुम हो एक सुंदर सपना
मैं करता  हूँ परन्तु
तुम्हारी आराधना
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
इस बारे में .....
स्पष्ट हैं मेरी यह अवधारणा
तुम मेरे लिये साकार हो ...
वन्दनीय ...एक प्रतिमा
तुम मेरी रूह का हो गहना
मुझे भी तुम अपनी कलाई में
पहन लों
समझ कर विशुद्द सोने का ....
मुझे कंगना
मैं तुम्हारी देह में हूँ
तुम्हारे मन में हूँ
तुम्हारी आत्मा में ही मुझे अब
सदा हैं रहना
हालां की
तुम हो एक सुंदर सपना
मैं करता  हूँ परन्तु
तुम्हारी आराधना
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
इस बारे में
स्पष्ट हैं मेरी अवधारणा
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

2 टिप्‍पणियां:

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Kedar Nath तुम हो एक सुंदर सपना
मैं करता हूँ परन्तु
तुम्हारी आराधना
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
इस बारे में
स्पष्ट हैं मेरी अवधारणा........adbhut prem mayi srujan..naman Dada
June 28 at 3:00pm · Unlike · 1

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Sakhi Singh kya bata hai swapn me milna hoke pyar karna sunder hai