बुधवार, 19 दिसंबर 2012

430-मुझ माटी के दीये में



430-मुझ माटी के दीये में

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, June 27, 2012 at 2:01pm ·


1-
मै हूँ काव्य और ,तुम ..हो कविता
तुम कविता लिखती हो ...मै पढ़ता हूँ
तुम्हारी सराहना पाकर
काव्य  सृजन में होती हैं ...मुझे सुविधा
तुम्हारे और मेरे बीच
पाठक और पाठिका का
अनूठा ....संबंध हैं सीधा
रूह के मौन से ...शब्द
छन कर आते हैं
मन की कामनाओं के
वशीभूत हुए ....बिना
मेरे लिये तुम नैसर्गिक सौन्दर्य हो
जिसे सुबह के स्वर्णिम  
या
साँझ की  लालिमायुक्त
मनोरम दृश्यों ..... सा
निर्निमेष मेरी आँखों ने
एकटक निहारना हैं सीखा
जैसे ...
घाटियों के विस्तार कों
समुद्र की गहराई कों
आकाश की उचाई कों ..देखकर
अचंभित रह जाता हूँ
वैसे ही मेरे प्रति ...
तुम्हारे ह्रदय की क्यारी में
अंकुरित ...मधुर सुकोमल भावनाओं के
छोटे छोटे पौधों में
मुकुलित पुष्पों के देखकर 
आश्चर्यचकित रह जाता हूँ
तुम शबनम हो जिसके स्नेह से
मैं तिनका हूँ ...भींगा 
मुझ माटी के दीये में
तुम हो ..प्रज्वलित शिखा
kishor

2-
प्रकृति की मौन हैं भाषा
शब्दों से परे हैं
सत्य की परिभाषा
रंग और सुगंध सी
होती हैं खामोशी
बहती हुई नदिया कहती हैं
मेरी तरह अपनी प्रियतमा से मिलोगे ही
छोड़ न देने पथिक तुम आशा
ह्रदय के भाव सागर में
उठने दो प्रेम की लहरों का ज्वार
एक न एक दिन
पूरी होगी तुम्हारी चिर अभिलाषा
कोरे कागज़ सा हैं यह संसार
पढ़ लिया करता हैं हर व्यक्ति
उसे अपने अपने मन अनुसार
बिना अक्षरों के ,
बिना स्वरों के ,
मूक पर उन्मुक्त होता हैं प्यार
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

1 टिप्पणी:

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Prakriti Rai bahut sundar kitni sahajta or sajagta dono ka samavesh hai apki panktiyon mein' shubhkamnayen !