बुधवार, 19 दिसंबर 2012

427-मैं जैसा था वैसा हीं हूँ




427-मैं जैसा था वैसा हीं हूँ

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, June 26, 2012 at 2:41pm ·
मैं जैसा था वैसा हीं हूँ
ज़रा भी नहीं गया हूँ मैं बदल
तुमसे बिछड़े हुए
व्यतीत हो गये हैं हालाकिं ..
अनेकों बरस ,अनंत पल
परन्तु मेरे ह्रदय में
तुम्हारे प्रति प्रेम उतना ही हैं प्रबल
तुमने अपनी जो तस्वीर दी थी
उसे आज भी तन्हाई में
एकटक निहारते हैं मेरे नयन
वह एक किताब भी हैं
जिसके प्रथम पृष्ट पर तुमने अपना नाम लिख दिया था
मुझे किये बिना कोई संबोधन
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं ...
मेरे सीने में तुम्हारी याद हैं अटल
वो पेड़ जहाँ तुम मुझसे मिलने आया करती थी
वृक्ष बनकर हो गया हैं सघन
वह सूनी  पगडंडी जिस पर चलती हुई
तुम लौट जाया करती थी
उसके अंतिम मोड़ पर
अब तक नहीं बन पाया हैं
तुम्हारे और मेरे ख़्वाबों का वह महल
लेकिन वह घर जिसमे
तुम रहा करती थी
उसमे कोई नहीं रहता
धराशायी सा -
लगता हैं वह मकान अब खंडहर
पर मुझे लगता हैं ..
तुम  वहाँ   मेरे लिये
खुद कों छोड़ गयी हों
इसलिए वहाँ ...
चला जाया करता हूँ मैं अक्सर
दीवार पर तुमने कुछ लिखा हैं
कोशिश किया करता हूँ
उसे पढ़ने की
पर धूमिल हो चुके हैं उसके अक्षर
शायद तुमने लिखा हैं
प्यार करना आसान हैं
पर प्यार कों निभाना नहीं हैं सरल
लेकिन तुम विश्वास करों ...
मैं जैसा था वैसा ही हूँ
ज़रा भी नहीं गया हूँ मैं  बदल
हो सकता हैं अब मैं तुमसे
कभी न मिल पाँऊ......?
पर अगले जनम में
तुम्हें तलाशने के लिये
अवश्य करूंगा मैं आरम्भ  से पहल
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

1 टिप्पणी:

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Prakriti Rai bahut sundar' apki rachnawon mein samvedna or bhav abhivyakti dono ka sundar samavesh hota hai...dohra saundarya spast jhalakta hai....