बुधवार, 19 दिसंबर 2012

419-तुम्हें क्या पता



419-तुम्हें क्या पता

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, June 23, 2012 at 1:03pm ·
तुम तो चली गयी मुझ पर
लगा कर आरोप

तुम्हें क्या पता
पहले ही की तरह
देखा करता हूँ तुम्हारी तस्वीरें मै रोज

तुम लगती हो मुझे बहुत खुबसूरत मै क्या करूँ
कहीं तुम्हें फिर न हो एतराज
मन ही मन डरता हूँ पर यह सोच

मै तो
तुम्हारे गरिमामय व्यैक्तित्व से अभिभूत  था
पर तुम समझ न सकी
इस बात का मुझे हैं बहुत अफ़सोस

कह दिया था तुमसे यू ही
की जब मिलोगी तुम्हें बांहों में भर लूंगा
बस मेरे इसी प्रयास पर
आ गया थ तुम्हें रोष

मांगता हूँ क्षमा तुमसे अपने इस ख्याल पर
चलो थाम लो मुझ
उड़ते हुए पतंग की
तुम अपने हाथो में फिर एक बार डोर

दोस्ती की नयी  शुरुवात  करे
तुम बस खामोश रहना
मुझे करने देना फिर से शोर

प्यार के कई रूप होते हैं
मिल ही जाते हैं बिछड़े हुए साथी
जीवन की राह   में किसी न किसी मोड़

किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

2 टिप्‍पणियां:

ravi mishra ने कहा…

bahut sunder bahut khoob likha hai aap wah.....................

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u ravi mishra ji