बुधवार, 19 दिसंबर 2012

417-हवा के झोंकें सा



417-हवा के झोंकें सा

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, June 22, 2012 at 8:08pm ·
तुम्हारी चूड़ियों की हूँ मैं खनक
तुम्हारे जुड़ें  में सजे
मोंगरे के  फूलों की हूँ मै महक
तुम जिसे दृढ़ता से थाम कर चलती हो
की कही फिसल न जाए
फिर भी तुम्हारे ही आँचल सा
जाता हूँ जरा जरा
मै तुम्हारी देह पर सरक
खड़ी रहती हो जब
आईने में खुद  कों निहारते हुए   एकटक
हवा के झोंकें  सा
आ जाता हूँ तुम्हारे करीब मै तब एकाएक
तुम शरमा कर होती हो जबतक सहज
मै तुम्हारी जुल्फों कों छेड जाता हूँ
तुम्हारी मुस्कुराहट कहती हैं
तुम्हें पसंद हैं मेरी शरारत
तुम मुझे भूल नहीं पाओगी
तुम्हें  इस तरह
प्यार करते रहने की मेरी
जो हैं आदत
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

1 टिप्पणी:

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Prakriti Rai ne kaha

आप की वाणी में ओजस्व है मित्र! हम सब के लिए परम कल्याण कारिणी,
चुम्बकीय शक्ति है, आप के पास, बौधिक योग्यता से ओत- प्रोत हों,सत्व गुण प्रधान...सदा हम सब में प्रफुल्ता बाँटने वाले सरल ह्रदय किशोर जी को सब की और से आभार!