शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

407-मौन हैं भाषा



407-मौन हैं भाषा

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, May 29, 2012 at 3:45pm ·

काव्य जगत में
शब्दों का यह नाता
कभी किसी से एकाएक
यूँ ही नहीं हैं बन जाता

देखना हैं अपने लेखन से
अपने और तुम्हारे व्यक्तित्व कों
मैं ..किस सीमा तक
अभिव्यक्त हूँ कर पाता

हर रिश्ते की
अपनी होती हैं पर
एक मर्यादा

दुनियाँ भले लगती हो माया
पर
कविता में ही प्रेम
प्रगट होता हैं आया

यूँ तो प्यार की
मौन हैं भाषा
परन्तु
दीर्घ वियोग के कारण
एकाकी मन की गहराईं  में 
दर्द के अंकुरित हो आये अक्षरों ने
स्वत: छंद रचना मुझे सिखाया 

किशोर  कुमार खोरेन्द्र