शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

391- खूबसूरत चन्दा सी एक परछाई



391- खूबसूरत चन्दा सी एक परछाई

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, May 16, 2012 at 7:27pm ·

मै तुम्हें सतह पर .कभी तट पर
लहर सा ..तलाशता हूँ
पर तुममे हैं..  सागर सी गहराई

मै पर्वत की चोटियों तक,
कभी मंदिरों के कलश तक   
ऊपर  उठकर ...
बादल सा ..तुम्हें छूना चाहता हूँ 
पर तुममे हैं .. अंबर सी ऊँचाई

मै तुमसे हर मोड़ पर
मिलना चाहता  हूँ 
पर तुम्हें तो उदगम से समुद्र तक 
नदी की तरह पसंद हैं सिर्फ तन्हाई 

मै अक्स सा
तुम्हें आईने में
अक्सर दिख जाया करता हूँ
कभी तुम मुझसे प्यार करती हो
कभी तुम मुझसे रूठ जाती हो
और कभी मुझसे ...
तटस्थ रहने की जिद्द में
तुमने ..मुझे भूल जाने की
सारी रस्मे हैं निभाई

खिड़कियाँ ,दरवाजे बंद कर लेती हो
छत पर सुबह शाम आना छोड़ देती हो
पर भीतर भीतर तुम्हारे
ह्रदय की मृदु भावनाएं
उमंगित हो ....
मेरे स्वागत हेतु लेती हैं अंगडाई


तुम मेरे जीवन में इस तरह से हो आयी
करीब रहकर भी दूर क्षितिज सी लगती हो
तुम मुझसे कहती हो
मै तो हूँ चांदनी रात  में 
झील में उतर आई
खूबसूरत चन्दा सी एक परछाई

किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

कोई टिप्पणी नहीं: