शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

385-मेरे काव्य की तुम हो प्रेरणा



385-मेरे काव्य की तुम हो प्रेरणा

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, May 14, 2012 at 12:50pm ·
मेरे मन का संसार हैं कल्पनामय
मै तो सर्फ एक प्रेमी का करता हूँ अभिनय
तभी लिख पाता हूँ
बेजान पन्नों पर
कविताएं मधुमय

पर अब नहीं पूछूँगा तुमसे कभी
क्या हैं तुम्हारे कपड़ों का रंग
कौनसा गुलाब तुम्हें हैं पसंद


अब नहीं बताया करूँगा ...
मेरे ह्रदय के सागर में
कितने ऊँचे उठते हैं स्नेह तरंग
तुम्हारी तस्वीर से भी हैं मेरी मित्रता
जब तुम नहीं होती हो
तब मै रहता  हूँ उसी   के संग

मुझे तुमसे नहीं हैं कोई शिकायत
मै कवि हूँ
यह तो हैं मेरी आदत
कभी मिलन के कभी विरह के
तभी रच पाता हूँ छंद
चाहो तो तुम तोड़ दो
मुझसे यह अलिखित अनुबंध

अपने इस निर्णय के लिये 
तुम हो स्वतंत्र
मेरे काव्य की तुम हो प्रेरणा
विस्मृत कर  देना मुझे
कभी यह सोचकर की मै था  
सिर्फ एक मनोरम प्रसंग  
 
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

2 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

भावों से नाजुक शब्‍द को बहुत ही सहजता से रचना में रच दिया आपने.........

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

सुषमा जी शुक्रिया