शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

384-इंतज़ार के पल



384-इंतज़ार के पल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, May 11, 2012 at 11:09am ·
काटों की तरह चुभते हैं
इंतज़ार के पल
शायद अब तुम न आओ
कहता हैं मुझसे आने वाला कल

टहनियां थाम कर मेरी उंगलियाँ
कहती हैं -चलो जरा अब संभल

थके थके से पाँव लगते हैं
उदास हो  जाता  हैं मन
ख्यालों में उड़ उड़ आता हैं
मेरे चेहरे से पसीने की बूंदों कों पोंछने
तुम्हारा गुलाबी आँचल

दूर जहाँ पर नदी मुड़ती हैं
वहां  तक खोजती  हैं तुम्हें
रह रह कर मेरी नजर
शायद  अभी भी आ जाओं
वही से तो हुई थी तुम  ओझल
 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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