शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

381-ऐसी तुम हो प्रकृति




381-ऐसी तुम हो प्रकृति

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, May 11, 2012 at 11:06am ·


 
ऐसी तुम हो प्रकृति
 कोमल शब्दों से
मृदु भावों कों जो देती हैं अभिव्यक्ति

खुद ही आईना ,खुद ही बिम्ब
और जो स्वयं हैं कभी काल्पनिक एक आकृति

सत्य के सागर की ओर जो हैं बहती
तुममे उस नदी सी हैं प्रवृति

प्यार सभी से हो करती
क्या बूंद ..क्या समुद्र ,
क्या धूल ..क्या पर्वत
सबके प्रति
जिसके  ह्रदय में हैं समदृष्टी

दूसरे भी उसे अपने से लगते हैं
दर्द सभी का काश मै दूर कर पाती
ऐसा जो हैं कहती

ह्रदय में तुम्हारे कृष्ण रहते हैं
राधा की तरह तुम्हारे मन में
मोहन के लिये हैं आसक्ति

नमन तुम्हारे उदगारों कों
तुम्हारी एकाग्रता ,तुम्हारे ध्यान कों 
तुम जैसे  हर  व्यक्ति
में हो ईश्वर हेतु चिर भक्ति
ऐसी तुम हो प्रकृति

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

2 टिप्‍पणियां:

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Prakriti Rai bahut bahut sundar likha hai apne ..shabd nahi hamare paas और shukriya bahut chhota hai
kya kahun ...bas itna ki Ma sarwasti ki vishesh kripa hai aap par !....naman karti hun apki pratibha ko !__/\__!sadhuwaad!
@प्रकृति राय

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

uprot tippani prakriti rai ne di hain