शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

38- प्रकृति की सुन्दर हैं छवि....



38- प्रकृति की सुन्दर हैं छवि....

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, June 25, 2011 at 10:23am ·







 प्रकृति की सुन्दर हैं छवि
निरख रहा उसे मै एक कवि ...
टेड़े मेडे हैं पथ
बिना लक्ष्य के चल रहा क्या यह तन रूपी रथ
पर सौन्दर्य के खिले हैं धरती पर सुमन
सितारों से आलोकित हैं अन्तरिक्ष का यह छत
पर उनमे कांटे भी हैं आंच भी हैं
कहता हैं पवन  ......
उन्हें छूना मत
स्नेह,करुणा ,प्रेम से ओतप्रोत हैं मानव मन
इसलिए हर व्यक्ति से करता हूँ
...मैं व्यवहार शिशुवत
पर वे पाते नहीं समझ
और बुझा देते हैं आस्था  का
मेरे ह्रदय मे 
प्रज्वलित ..यह एक दीपक
और मिटा जाते हैं ..
मैं लगाता हूँ उनके माथे पर
सविन्म्र स्नेह का ...जो तिलक
भूलकर अहंकार ...बन जाते हम सब  यदि करूणागार
 स्वप्न हो जाते हम सभी के साकार
किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: