शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

373-स्वप्न ही सच लगते हैं



373-स्वप्न ही सच लगते हैं

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, April 28, 2012 at 7:10pm ·


सूदूर तुम
चमकती हुई जैसे एक तारा
जिसकी नीली ,कभी सुनहली होती हैं आभा
करीब तुम्हारे पहुँचने का
निष्फल हो जाता हैं मेरा प्रयास सारा
नियति की लक्ष्मण रेखा  पर ही चलकर
पूरी करनी हैं अपनी जीवन यात्रा

स्वप्न ही सच लगते हैं जिसमे आकर
तुम कर जाती हो मुझसे मिलने का वादा
वियोग के खालीपन कों भर जाया करता हैं
ख्यालों के आँगन में आकर
शीतल साँझ सा तुम्हारा साया

तुम्हारे प्रति उपजी
यह बेचैनी ,यह पीड़ा ही तो
 प्यार हैं .......
विरह  की निशा ने
प्रत्येक  करवट में मुझे .....
यही हैं समझाया
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

कोई टिप्पणी नहीं: