शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

372-तुम्हारे दिव्य रूप का दरशन



372-तुम्हारे दिव्य रूप का दरशन

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, April 28, 2012 at 10:03am ·



यह प्रेम ..क्या सिर्फ हैं दैहिक आकर्षण
या हैं
तुम्हारे मन के प्रति
मेरे मन का समर्पण
मैं अपनी आंतरिक छवि कों
तभी निहार पाता हूँ
जब मेरे सम्मुख आते हैं
तुम्हारे उज्जवल नयनों के दो दर्पण
एक युवक मेरे भीतर हैं
जो तुम्हारी अंतरात्मा के भीतर छिपी युवती कों
करना चाहता हैं
अपनी निश्छल सम्पूर्णता  कों अर्पण
केवल ईश्वर के चरणों में ही नहीं .....
मनुष्य ,..मनुष्य के समक्ष भी
कर सकता हैं ......
अपने अहंकार का विसर्जन
मेरी तीसरी आँख कों इसीलिए हुआ करता हैं अक्सर
तुम्हारे दिव्य रूप का दरशन
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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