शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

36-अपना मन उज्जवल



36-अपना मन उज्जवल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, June 25, 2011 at 9:50am ·



तुम मुझसे क्यों करती हो छल
तुमसे मिलने के लिये
इंतज़ार करता हूँ तुम्हारा हर पल
आती भी हो तो
मुस्कुरा कर तुरंत देती हो चल
अपने भीतर के उजालों में
कयों छिपा कर रखती हो अपना मन उज्जवल
तीर सा चूभ जाते हैं बस तुम्हारी आँखों के कोरो तक
खीची काजल की तीक्ष्ण रेखाए श्यामल
सुन्दर आकार की परछाई तुम्हारी मेरे ह्रदय की बाँहों में बसी हुई हैं निश्चल 
एतबार करो प्रिये ..मेरा आकर्षण तुम्हारे प्रति हैं निश्छल
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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