शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

355-रेत के पन्नों पर



355-रेत के पन्नों पर

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, March 29, 2012 at 2:42pm ·
 
 रेत के पन्नों पर
एक गीत लिखने लगी हैं चांदनी

स्निग्ध किरणों का स्पर्श पा
हर नदी लगने लगी हैं ..मंदाकनी

बरगद की छाया तक ,चलकर आ गयी
देखने जगमगाते सितारों की ,.. छावनी

सफ़ेद लकीर सी उभर आयी हैं पगडंडियाँ
नजर नहीं आ रहा पर कोई भी आदमी

यह मौन का कौनसा मधुर राग हैं
जिसे छेड गयी हैं आज रागनी

घाटियों में
उतर आये हैं नर्म रुई से बादल
छूना मत उन्हें
कांच सा तुम कही दरक न जाओ
सम्मोहित कर लेती हैं उनकी सादगी

रेत के पन्नों पर
एक गीत लिखने लगी हैं चांदनी

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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