शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

35-कभी न कभी ........



35-कभी न कभी ........

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, June 25, 2011 at 9:42am ·

 मन के आकाश में प्यार के बादल उमड़ते हैं
इंतज़ार की जमीं पर जब ...
तुम दिखाई नहीं देती हो तब
आँखों से झरे आंसुओं से वे बादल भींग जाते हैं
और वे
तुम्हें तलाशने के लिये नदियों के जल का रूप ले लेते हैं
लेकिन तुम तो
अपने ही भीतर छिपी हुई मुझसे अनंत दूर रहती हो
तुम्हारी रूह तक पहुँचने   के लिये
इस धरती पर
मेरी यात्रा ....
किस सीमा तक सहायक होगी मुझे नहीं मालूम
फिर भी मुझे ...बहना हैं
फिर भी मुझे ....चलना हैं
कभी न कभी तो तुम
मुझे निहार पाओगी
घाटियों में बिखरे हुए मौन के सूखे पत्तों के दर्द की तरह
मेरी पीड़ा को ...महसूस कर पाओगी
तुम मेरे लिये जल हो और
बिना पानी के ...तुम तक पहुँचने  के लिये मै
किस तरह से ....
रेत का जिस्म बनकर चिलचिलाती धूप में
तुम्हारी ओर धीमी गति से सरकता हूँ
कभी न कभी  तो ..समझ पाओगी

.किशोर कुमार खोरेन्द्र 


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