शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

349-ग्रामीण पर्यावरण




349-ग्रामीण पर्यावरण

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, March 28, 2012 at 1:16pm ·

कट कर आ गयी जब
खलिहानों में गेहूं की फसल

पसरा खेतों में सूनापन सकल
पगडंडियों पर बन गयी ..
धूल की नयी परत

धूप की आंच से
हवा होने लगी गरम
बबूल की पत्तियाँ हुई और सघन
पर छाँव में उनके
और तीखी हुई काँटों की नुकीली चुभन

पलाश के फूलों सा रंग गया
ग्रामीण पर्यावरण
झरी पत्तियों सा बिखरने लगा सूना वन

प्रणय कों भाने लगे
परिणय सूत्रों के बंधन
आकाश के टिमटिमाते तारों संग
जागने लगी हैं तरुणाई
सोचने लगी हैं कब होगा
प्रियतम से लगन

मिलन की आशा में जीता सा लगा
यौवन
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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