शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

348-तुमसे हैं मेरा गहरा संबंध



348-तुमसे हैं मेरा गहरा संबंध

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, March 28, 2012 at 1:13pm ·



तुमसे हैं मेरा गहरा संबंध
निशर्त हैं पर यह प्रणय बंधन

तुम्हारी आँखों के इशारों पर
उड़ता हुआ हूँ ..मै एक पतंग

तुम्हारे सौन्दर्य कों निहार कर
खिल उठते हैं मेरे मन में पुष्प अनंत

तुम्हारी छवि का करते ही स्मरण
मेरे मन में भर आता हैं उमंग

मेरे अहंकार की चट्टानों कों
चूर चूर करने वाली
तुम हो एक जल तरंग

सावन की तुम रिमझिम वर्षा हो
जिससे भींगकर पुलकित होते हैं
मेरे अंग अंग

कभी इन्द्रधनुष कहता हैं मुझसे
तुममे समाहित हैं उसके सारे रंग

कभी लगती हो तुम
मुझे नदी सी ...चंचल
इसलिए नहीं आबद्ध कर पाते हैं
तुम्हें सम्पूर्णत : मेरे छंद

छिड़ते ही तुम्हारा प्रसंग
बढ जाती हैं
मेरे ह्रदय की धड़कन

तुम रीति रिवाज से बंधी हो
पर मै तुमसे मिलने के लिये
करता रहता हूँ
नियमों का उल्लंघन

तुम ही हो.. मेरा बसंत
तुमसे हैं प्रिये ..मेरा गहरा संबंध
 किशोर कुमार खोरेन्द्र

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