शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

343-तुम ही हो मेरे ह्रदय का स्पन्दन



343-तुम ही हो मेरे ह्रदय का स्पन्दन

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, March 27, 2012 at 12:02pm ·


दूर दूर तक ...पसरा हैं सूनापन
खाली खाली से मन में
सुबह की धूप सी भर जाती हो तुम अपनापन
धूल उडाती जब लौट जाती हैं हवा
लगता हैं तब
हुआ हो जैसे मेरे गाँव में तुम्हारा आगमन
जब पिछली बार
मुझसे मिलकर लौट गयी थी
तब तुम्हें एकटक निहारते रह गये थे मेरे नयन
बहुत निर्मम था वह क्षण
मेरी पलकों के भीतर रह गये थे अश्रु कण
तुम्हें याद करते करते व्यतीत हो रहा हैं
मेरा शेष जीवन
तुम ही हो मेरे ह्रदय का स्पन्दन
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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