शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

337-उसका चेहरा भी लगता हैं धूमिल



337-उसका चेहरा भी लगता हैं धूमिल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, March 9, 2012 at 10:07am ·




प्यार हो जाता हैं कयों ,कहना हैं मुश्किल
अकारण करीब आ ही जाते हैं दो दिल

इस जहाँ में हर कोई हैं एक मुसाफिर
वक्त मिलता हैं मिलन के लिये सिर्फ दो दिन

इंतजार में उम्र कट जाती हैं
बरसो सा लगते हैं तब हर पल क्षीण

नाम और पता मालूम नहीं होता
याद करो तो उसका चेहरा भी लगता हैं धूमिल

इस दुनियाँ में मै क्यों आया हूँ
कोई राह नहीं जो मुझे पहुंचाए मंजिल

कही वो ज्योति तुम तो नहीं हो जिसके खातिर
जल कर मुझ परवाने कों मिटटी में जाना हैं मिल
 किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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