शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

330-तुम्हारे बिना



330-तुम्हारे बिना

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, March 4, 2012 at 8:53am ·



तुम्हारा जीना ऐसा हैं जीना
मानो झंकृत हो ..उठी हो
तुम्हारे ह्रदय की वीणा

जिसके प्रति
मुझमे हैं आस्था
मुझमे हैं विश्वाश
मुझमे हैं प्यार
मेरे लिये तुम वही हो
एक सजीव प्रतिमा

तुम महाकव्य हो
मेरे द्वारा असंभव हैं जिसकी समीक्षा

परमात्मा में तुम्हारी आत्मा लीन हैं
इसलिए अदभुत हैं तुम्हारे व्यैक्तित्व की गरिमा

आकाश में पसरी हो जैसे
सूर्योदय की मनोरम अरुणिमा

तुम अपने ध्यान के कोहरे के
उस पार हो
नि:शब्द
नि:स्वर
और विदेह सी ..
तब भी सुन लिया करता हूँ तुम्हारे मूक पदचापों कों
जब स्मृति में बिजली सी तुम कौंधती हो .ओ विभा

गहन तम लिये आती हैं जब निशा
तब भी तुम्हारी याद में दीपक सा जलता हूँ
करते हुए तुम्हारे आगमन की चिर प्रतीक्षा

जब तुम मौन में हो जाती हो विलीन
तब प्रतिउत्तर के अभाव में
खुद कों अकेला पाता हूँ
अन्तरिक्ष में जैसे
शेष रह गया होऊ मै सिर्फ एक उपग्रह
तुम्हारे बिना

किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

2 टिप्‍पणियां:

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

Prakriti Rai आपकी इस रचना के लिए क्या कहूँ ? शब्द नहीं मेरे पास बस. प्रेमपूर्ण एहसास है..जैसे कोई अंतरंगता से बहता है मुझमे..प्रतिपल कुछ न कुछ रचता है, धडकनों की भी गिनती है उसके पास खुशबू से सराबोर वो अक्सर कहता है मुझसे सुनों तुम दूर नहीं पास हो मेरे ! परायी नहीं ख़ास हो मेरे..छू लेता है मेरी भावभीनी सम्वेद्नावों कों, जीवन सौंदर्य कों उतार देता है अपनी लेखनी के मध्यम से कह जाता है जों कुछ भी है मन में उसके यथार्त के धरातल पर ले आता है अपनी रचनाये, फिर ये तो हमपर है की हम उसे पढ़ कर याद रखें या भूल जाएं...

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

uprot tippani prakriti rai dvara di gayi hai