शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

328-चाँद की तरह जैसे उसे मैं



328-चाँद की तरह जैसे उसे मैं

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, February 23, 2012 at 2:31pm ·
 



तुम कर ही लेती हो मुझे सम्मोहित
अपनी बिंदिया के वृत्त से मुझे घेर कर
अपने ओंठों के रंग से मुझे रंग कर
अपने गालों की कोमलता से मुझे छूकर
तुम्हारा चेहरा मुझे
परीचित सा लगता हैं
चाँद की तरह जैसे उसे मैं
सदीयों से निहारता आया होऊ


तुम हो यदि असीम विस्तार
रह जाता हूँ मैं
तुम्हें बस निहार
मौन तुम्हारी भाषा
फिर भी अक्षर अक्षर
तुम्हें पढ़ने की
मुझमे हैं सुदृढ़ अभिलाषा
कौंध जाती हों तुम
प्रकाश बूंदों सी
कहती हो .....
मैं ही हूँ
तुम्हारे मन में जागी
अकुलाहट भरी आशा

तुम्हारे अधरों पर हैं एक गीत
तुम्हारी आँखों में हैं
मेरे लिये प्रीत
सूर्य प्रतिबिम्ब सी तुम्हारी बिंदिया
मुझे कर गयी हैं सम्मोहित

 किशोर कुमार खोरेन्द्र 


3 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

गहन अभिवयक्ति......

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

pyar barsati rachna.. behtareen:)

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

सुषमा जी ,मुकेश कुमार सिन्हा जी ..बहुत शुक्रिया