शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

327-कहते हैं की तुम माया हो



327-कहते हैं की तुम माया हो

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, February 23, 2012 at 10:30am ·
  

तुमसे ..
मेरा वियोग हैं चिर
प्रेम में सतत
बनी रहें यह पीर
ह्रदय में तुम्हारी ही छवि हैं
दिखलाऊं क्या उसे चीर
आदि से पूर्व ,अंत के पश्चात
और वर्तमान में
बह रही हैं
मेरी धमनियों में तुम्हारी प्रीत
शब्दों से परे ,स्वरों से निर्लिप्त
मौन का तुम हो गीत

सुबह की हवा के झोकों सा आ जाती हो
सांझ की तरह फिर लौट जाती हों
तुम्हारी याद में तिल तिल
जलता हूँ दीपक सा ....
जब हो जाता हैं निशा का गहन तिमिर

कहते हैं की तुम माया हो
परछाई सी आकर
क्या तुम इसीलिए .....
कर जाती हो मुझे भ्रमित
तुम तो मेरे प्रेम भाव की हो प्रतीक
जन्म मृत्यु ..अतीत
तुम ही हो मेरी परम सखी
मैं हूँ तुम्हारा प्रिय मीत

किशोर कुमार खोरेन्द्र 




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