शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

326-सपनो के क्षितिज के द्वार पर तुम हो खड़ी



326-सपनो के क्षितिज के द्वार पर तुम हो खड़ी

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, February 22, 2012 at 1:47pm ·



तुम तक पहुँचना


संभव नहीं है


सपनो के क्षितिज के द्वार पर 
तुम हो खड़ी

कांच के फलक के 
उस पार इन्द्रधनुष है

पंखुरियों के मुरझाने का 
जल प्रतिबिम्बों कों भी दुःख है
बबूल के काँटों सा यथार्थ नुकीला है
रहस्यमय हम स्वयं लगते है
यही तो हम सबका गुण है
मेरी प्रेम कहानी अनछपी है
तुम हो उसकी नायिका बड़ी
तुम तक पहुँचना 


संभव  नहीं है


सपनो के क्षितिज के द्वार पर 
तुम हो खड़ी
 

सागौन के पत्तों पर भी सौभाग्य की रेखाए हैं
धूप से घिरी हुई छाया हैं
वन में एकांत जा ठहरा हैं
दीपशिखा कहती हैं गहन तिमिर ने मुझे अजमाया है
तनहा मैं नहीं हूँ
ख्यालों में तो तुम मेरे सदा रहती हो सखी
तुम तक पहुँचना 
संभव नहीं है
सपनो के क्षितिज के द्वार पर 
तुम हो खड़ी
 


धूप के जाल कों समेट कर 
लौट जाती हैं संध्या
चाँद की दुधिया रोशनी में 
नहाते हैं पर्वत और भवन
पेड़ भी मनुष्य सा लगता है
दूर से आधी रात कों अक्सर
रुकता नहीं मन रेल के भीतर भी 
करता रहता हैं भ्रमण
प्रेम करना चाहों तो
बिखरा दो अपने अधरों पर 
सूर्योदय सी एक हँसीं
तुम तक पहुँचना 
संभव नहीं है
सपनो के क्षितिज के द्वार पर 
तुम हो खड़ी

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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