शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

324-इतराता सा लगता हैं बादल



324-इतराता सा लगता हैं बादल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, February 19, 2012 at 2:37pm ·




इतराता सा लगता हैं बादल
आमंत्रित करता सा लगता हैं
दूर तक फैला नदी का आँचल
नजर न लगे यह सोच
लगा जाती हैं मेरी आँखों में
निशा ..काजल

पर्वत श्रृंखलाएं फैला कर अपनी बाँहें
पूछती हैं
डूबते सूरज के सिंदूर से
रंगीन हुआ ना तुम्हारे मन का आँगन

तलाश रहें हो जिसे वह मैं ही हूँ
कहती हैं चांदनी
कण कण से पहाड़ों तक का
मैं बनी हूँ शुभ्र आवरण

हरे ,पीले ,लाल ,बैगनी ..रंगों से सजी प्रकृति ही
तो हैं मेरी अपरिचित मूक दुल्हन
जिसे निहारता मैं हूँ अपलक
शब्द कम पड़ जाते हैं
कर न पाता जिसके कारण
उसके सुंदर रूप का सम्पूर्ण वर्णन

मौन के इस संसार में मैं हूँ अकेला
कभी नदी का जल
कभी सागर का तट
बन जाते हैं मेरे लिये दर्पण

खुद की परछाई कों पाता हूँ
कभी साथ अपने
कभी लगता हैं तन और मन से
परे हैं अस्तित्व मेरा ...
वन के एकांत में ..
करता हैं विचरण

लेकिन
तुम्हरी आँखों के आईने में
प्रेम के इन्द्रधनुष का
मैं करता हूँ दर्शन
किशोर कुमार खोरेन्द्र

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