शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

318-एक कहानी



318-एक कहानी

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, February 17, 2012 at 10:53am ·


हर ह्रदय की अपनी हैं
एक कहानी
हर आँखों में हैं
खारा पानी
दर्द अधरों तक आकर
रह जाते हैं
मूक हो जाती हैं
न जाने कयों तब वाणी

लोग बहुत हैं दुनियाँ में
पर रह जाता हैं तन्हा
चित्त अनुरागी

तब ..
प्रकृति के सौन्दर्य से अभिभूत हो
मन की प्रवृति हो जाती हैं रोमानी

परिवर्तनशील हैं मौसम
कभी पतझड़ ,कभी बहार
कभी बरखा करती हैं
अपनी मनमानी

पर्वत ,जंगल ,
बादल ,अंबर
सब हैं साथी
मैं भी बहता हूँ
जब बहती हैं पुरवाई सुहानी

उदगम से मुहाने तक
चली आई नदिया
भूली नहीं हैं
पर वह अपनी जवानी
हर ह्रदय की अपनी हैं
एक कहानी
हर आँखों में हैं
खारा पानी
 
किशोर  कुमार खोरेन्द्र 



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