शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

314-मिलन की रात आयी



314-मिलन की रात आयी

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, February 16, 2012 at 10:53am ·
  
 विरह के दिवस का हुआ अवसान
मिलन की रात आयी
गोधूली बेला के उपरान्त

संध्या वधू सी
तुम संवर आयी
झर गए पुष्प
बिखर गयी पंखुरियां
तुम्हारे सौन्दर्य कों निहार

अंबर से उतर कर
चांदी सी रश्मियाँ बिछ गयी
प्रणय अनुकूल वातावरण हेतु
और सघन हो गया
सूनेपन का एकाकी एकांत

बाँहों में भरने से पहले
चंचल लहरों की तरह बलखा कर
तुम लौट गयी
असहनीय लगने लगे
निमिष भर के अंतराल


बादलों के झरोखों से
छिप छिप कर झांकने लगा चाँद
तब कोहरे के झीने ऑट में
तुमने उतारे अपने अलंकार

सुनहरी हुई नदी ....
मांग के बिखरे कुंकुम से
रंग गया सागर अपार
खुलते ही अधमुन्दें नयनों के पलकों के
खिल उठा कमल ताल

घूँघट के सदृश्य हुआ
अरुणिम आकाश
तुम्हरी सांसों की महक से
छाया भोर में तब उन्माद

अपलक देखता रह गया मैं
शबनम के मोतियों से जड़े
धुली हुई सुबह सी निर्मल
तुम्हारी देह का श्रृंगार

किशोर कुमार खोरेन्द्र 


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