शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

311-शायद तुम्हें ज्ञात न हो



311-शायद तुम्हें ज्ञात न हो

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, February 9, 2012 at 3:10pm ·


मैंने चुरा ली हैं
तुम्हारी तस्वीर
अब तक जिसे ख़्वाब में
देखा करता था
उस चेहरे के हुआ हूँ
मैं आज मुखातिब

यह जानकर
क्या पता
तुम हो जाओं आश्चर्यचकित

मेरे हृदय में भी प्रेम का सागर हैं
जिसे
मैं तुम्हें करना चाहता हूँ समर्पित

शायद तुम्हें ज्ञात न हो
छुप छुप कर मै ही
तुम्हें देखा करता हूँ
जब तुम
मुंह फेर लिया करती हो
मेरे विपरीत

यह कह पाना
की
मै तुमसे प्रेम करता हूँ
तुम्हारे सामने

बहुत हैं कठिन

न जाने तुम क्या समझ जाओं
प्यार के भी तो
कई रूप होते हैं
जान लो इसे
यह हैं सिर्फ स्नेह मिश्रित

किशोर कुमार खोरेन्द्र 


3 टिप्‍पणियां:

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

प्रेम ढाई अक्षर का और व्यापक फैलाता तेज !!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

प्रेम की अलौकिकता

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

विभा रानी श्रीवास्तव जी ,रश्मि प्रभा जी ..सराहना के लिए शुक्रिया ,आभार ..