शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

310-यह तो इस मौसम का हैं दोष



310-यह तो इस मौसम का हैं दोष

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, February 8, 2012 at 2:32pm ·


मैं हूँ निर्दोष
यह तो इस मौसम का हैं दोष
इसलिए तुम्हें 
मेरी निगाहें रही हैं खोज
कभी धूप ,कभी छाँह
जिसका न कोई छोर
लौट कर आओगी
क्या अब
क्षितिज के पारदर्शी कांच कों तोड़
ताक रहा मैं सूनी राह की ओर
रह रह गूंजती हैं
कोयल की आवाज
झूल जाती हैं कमनीय टहनियां
झकझोर देता हैं उन्हें जब
हवा का तेज शोर

धीरे धीरे पत्तों पर
उभर रहा लाल भूरा रंग
छा रहा सर्वत्र उमंग
छोड़ गया हैं कोहरा ..
धुली हुई भोर
अपने रेशमी जाले कों खोल
प्यास बुझी नहीं
कह रही कलियाँ
पीकर शबनम की बूंदे अनमोल
धूप कह रही
बादलों के बिना कितना
अकेला लग रहा हैं
यह नीलाम्बर
धूल धूसरित एकांत का
मुझे घेर जाता हैं
तुम बिन
एक अपरिचित सा
निर्जन कोलाहल अनबोल

इंतज़ार में ही हैं आनंद
सुन्दरता के पग में बंधी
घुंघरुओं का स्वर कर रहा
मुझे आत्मविभोर
इस अवसर पर टूट कर बिखर जाते हैं
क्षण क्षण
अनगिनत सपनों के महल
जैसे कांप गया हो जल
और
हिलोर के हाथों
बिखर गए हो दहल
प्रतिबिंबित कमल के
....पोर पोर
 
किशोर कुमार खोरेन्द्र 




3 टिप्‍पणियां:

Khare A ने कहा…

prakirti ki sundarta ko upma ban kar man ke bhavon ko preshit karna koi aapse seekhe!

uttam kriti!

गुड्डोदादी ने कहा…

मेरी निगाहें रही हैं खोज
कभी धूप ,कभी छाँह
जिसका न कोई छोर
(अति सुंदर )

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

शुक्रिया आलोक खरे जी ,और गुड्डों दादी जी ..