शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

309-उस अनाम अदृश्य काल्पनिक प्रेमिका के लिये एक कविता"



309-उस अनाम अदृश्य काल्पनिक प्रेमिका के लिये एक कविता"

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, February 8, 2012 at 2:23pm ·
उस अनाम अदृश्य काल्पनिक प्रेमिका के लिये एक कविता"


आजीवन
तुम्हें लिखता रहूंगा ख़त
यह मालूम किये बिना की
तुम मेरे इस व्यवहार से
सहमत हो या असहमत

विभिन्न रंगों से सुसज्जित हैं
सजीव यह रंगमंच
हो सकता हैं
रह जाए
यह जिवंत नाटक
एकाभिनय मात्र बन

तुम्हारे पात्र कों भी
मैं ही जिऊँगा
लगता हैं जीवनपर्यंत

ऐसे भी तुम्हें आखिर तक
रहना हैं मौन
उस मौन कों पढ़
संवाद लेना हैं मुझे
हर दफे गढ़

ताकि बनी रहें
हर दृश्य की स्थिति
असमंजस मय
तुम इस काव्यनाटिका
की हो नायिका
मेरे लिये तुम ही
वह रूप हो
वह शब्द हो
वह अर्थ हो
तुम ही लय ,गति ,ताल हो
तुम ही अलंकार और हो छंद

मुझे करने दो सृजन
प्रिये ..! बिना किसी अनुबंध

आजीवन
तुम्हें लिखता रहूंगा ख़त
यह मालूम किये बिना की
तुम मेरे इस व्यवहार से
सहमत हो या असहमत

किशोर कुमार खोरेन्द्र 


3 टिप्‍पणियां:

Khare A ने कहा…

मुझे करने दो सृजन बिना किसी अनुबंध!

क्या बात है! सुन्दर प्रियेतम भाव!

गुड्डोदादी ने कहा…


तुम्हारे पात्र कों भी
मैं ही जिऊँगा
लगता हैं जीवनपर्यंत
(माझी बगैर नैय्या विहल )

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

आलोक खरे जी ,गुड्डो दादी बहुत शुक्रिया