गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

298-यह क्षितिज



298-यह क्षितिज

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, January 30, 2012 at 9:52am ·




सिर्फ तुम्हरी तस्वीरों तक ही
मै कैसे रह सकता हूँ सिमित
तुम्हें तलाशते हुए
भटक रहा हूँ
जंगल जंगल ,पर्वत पर्वत
रोक लेता हैं मुझे पर
यह क्षितिज

क्या तुम सागर के उस पार रहते हो
या
शिखरों से भी उंची उचाईयों में
रह कर जीते हो
या
केवल मेरे मन की सुंदर कल्पना हो
जिससे मैं
स्वयं होते रहता हूँ सुशोभित

कभी कभी तो लगता हैं
मै ही आईना हूँ
मैं ही हूँ बिम्ब और प्रतिबिम्ब
पर कोई तो ऐसा व्यक्ति होगा
जिसके प्रति मै हो पाउँगा 
कभी न कभी समर्पित

या फिर
रह कर अकेला
क्या जीता रहूंगा हो समूह के विपरीत

तुम्हें यदि हो फुरसत
तो
तुम दो इज़ाज़त
मेरे करीब आकर
ताकि
तुम्हरी आँखों में निहार सकूँ यह नीला जल
फैला हैं जो मीलो मील

तुम्हारे स्पर्श से जान सकू की
ह्रदय की भावनाए सच्ची होती हैं
नहीं होती हैं अज्ञात दर्द से भरी हुई
मात्र टीस

सत्य के दोनों होते हैं रूप
एक निराकार , 
एक आकार ...सचित्र

किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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