गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

290-तुम यदि धरती हो




 
 290-तुम यदि धरती हो


by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, January 16, 2012 at 11:04am ·



मेरे ह्रदय में
तुम्हारी छवि का हैं वास
मेरा मन कहता हैं
कभी समाप्त न हो
तुम्हारा यह प्रवास

तुम महकती रहो मेरी साँसों में
तुम बहती रहो मेरी रगों में
मेरी दिनचर्या कों मेहंदी सा
रंग जाते हैं तुम्हारे ख्याल
तुमने कहा हैं पर ....
स्वप्न में भी मेरे नजदीक आने का
तुम न करना प्रयास

फिर भी बाँध लेता हैं मुझे
तुम्हारा काल्पनिक बाहुपाश
तुम्हारी आँखों की गहराई में
डूबा रह जाता हूँ
तुम्हारे चरित्र की ऊँचाई के कारण
तुमसे अछूता रह जाता हूँ
तुम्हारी देह की घाटियों में
मेरी आत्मा भटक रही हैं
तुम्हारी रूह तक पहुँचने की
मेरे भीतर हैं तीव्र आस

लेकिन तुम्हारे और मेरे बीच दूरी हैं
तुम यदि धरती हो
तो मैं हूँ आकाश

किशोर कुमार खोरेन्द् 

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