गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

285-यह हैं मेरा नसीब



285-यह हैं मेरा नसीब

 

 

 

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, January 6, 2012 at 12:02pm ·
मैं सिक्का था अप्रचलित
अपनी नजरों में गया था गिर
तुमने मुझे खरा सोना समझकर
उठा लिया
यह हैं मेरा नसीब

आरम्भ में तुम्हारे रूप से था प्रभावित
तुमने बतलाया
मोहब्बत में .यही हैं वरजित

रूह से रूह का मिलन तभी संभव हैं
जब मन हो जाए स्वयं नियंत्रित

प्यार करना मुझे आता नहीं था
तुमसे मिलकर जाना प्रेम ही हैं
जीवन का मधुर संगीत

देह से देह का आकर्षण होता हैं क्षणिक
ह्रदय की धड़कने यदि आपस में मिल जाए
तो सुर लगता हैं ...अलौकिक

दो अजनबी एक हो जाते हैं
मानो वे सदीयों से हो परीचित

हालाँ की तुम
मुझसे मीलों दूर रहती हो
पर स्मृति के उपवन में
अब खिली रहती हो
पंखुरियों सी  हो ..सुरभित

किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

कोई टिप्पणी नहीं: