गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

282-तुम ही तो हो मेरी प्रियतमा



282-तुम ही तो हो मेरी प्रियतमा

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, January 3, 2012 at 1:27pm ·



तुम ही तो हो मेरी प्रियतमा
छंदों में तुम्हें ही हूँ रचा
मेरे ह्रदय की धमनियों में
एक पवित्र नदी सी बहती हो
तुम ..ओ निरमला

 तुम्हारे आगोश में
हो जाना चाहता हूँ लापता
तुम्हारी बांहों में हैं प्यार
कोहरे सा लिये विस्तार घना

तुम सच कहती हो
मौन रहती हो
इसलिए सदा .....

तुम तक पहुंचू कैसे
क्षितिज का तुम पर हैं पहरा

मैं आकाश के नीले रंग सा
तुममे घुल जाना चाहता हूँ
तुम्हारा मन हैं
पर सागर सा गहरा

तुम खेतों में खडी हो
ओढ़कर
सरसों की पीली चुनरिया ओ धरा

तुम बिन मैं हो जाया करता हूँ सहरा
 बबूल के काँटों की तरह चुभती हैं जब छाया
तब जान पाता हूँ 
तुम्हारे सिवा कोई नहीं हैं अपना

भले लोग कहते रहें जीवन हैं एक सपना
तुम ही तो हो मेरी प्रियतमा
 किशोर कुमार खोरेन्द्र

4 टिप्‍पणियां:

prritiy----sneh ने कहा…

sunder rachna
shubhkamnayen

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

thank u priti ji ..aapne blog dekha ..aur sarahna bhi ki ..

Khare A ने कहा…

सुन्दर राग-अनुराग!

गुड्डोदादी ने कहा…

तुम खेतों में खडी हो
ओढ़कर
सरसों की पीली चुनरिया ओ धरा
(चल री सजनी अब क्या सोचे )