गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

273-सुन लो मेरा स्पन्दन



273-सुन लो मेरा स्पन्दन

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, December 24, 2011 at 11:50am ·
 

सुन लो मेरा स्पन्दन
 आभा से दमक रहा हैं
तुम्हारा मुख मंडल

महक रही हैं तुम्हारी साँसें
उसमे घुला हो जैसे चन्दन
 
तुम्हारी ही छवि निहारते हैं
मेरे नयन
जब जब होता हैं
सम्मुख मेरे दरपन
 
कभी किया था
तुम्हारी उँगलियों ने मेरा स्पर्श
उसे महसूस कर
मेरे रोम रोम में
आज भी होते हैं सिहरन
 
 तुम्हारा स्मरण
ही हैं अब मेरा जीवन
तुम्हारी मुस्कराहट की बान्हे
घेर लेती हैं मुझे
मधुर लगता हैं मुझे
उसका काल्पनिक बंधन
 
तुम सूर्यमुखी हो
खिली खिली सी हैं तुम्हारी सूरत
मैं हूँ तुम्हारी पंखुरियों में
रंग भरनेवाला स्वर्णिम सूरज
 तुम हो सुमन
इसीलिए तो कर रहा हूँ
मैं मधुप ..
तुम्हारे समक्ष गुंजन

सुन लो मेरा स्पन्दन
 किशोर  कुमार खोरेन्द्र 

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