बुधवार, 12 दिसंबर 2012

258-बीच में शीशे की पारदर्शी हैं



258-बीच में शीशे की पारदर्शी हैं
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, December 5, 2011 at 10:02pm ·


बीच में शीशे की पारदर्शी हैं


एक दीवार

एक तरफ मैं हूँ
तुम हो उस पार

खुद कों कैद कर पिंज़रे में
सुरक्षित समझते हैं
रिश्तों कों निभाने की भी एक सीमा हैं
घेरों के नुकीले हैं तार

फिर भी मन का पंछी लाँघ जाता हैं
छूने के लिये
कल्पनाओं का आकाश

जीते हैं अपने साथ रख
धुंध में लिपटाकर
एक मानवीय आकार

न तुम्हें मुझसे हैं
न मुझे तुमसे हैं
हम दोनों कों हैं
बस ..एक दूसरों के सायों से प्यार

सुन नहीं सकते एक दूजे की आवाज
यूँ तो रस्मों का ,रिवाजों का
शोर बहुत हैं
पर मौन हैं
सच का संसार

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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