शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

25-सूनी राहों के जंगल में



25-सूनी राहों के जंगल में

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, January 12, 2011 at 7:10pm ·



मछली रहती हैं सागर के नीले पिंजरे मे   कैद
 पंछी रहता हैं उन्मुक्त आकाश में उड़कर भी बेचैन
 आदमी कों तरसाती हैं ..बूंद बूंद इच्छाएं ..
शून्य मैं वृताकार सा फ़ैल


 अपनी नीड़ की दुनियाँ में रहकर ..
मासूम धडकनें सोचती हैं ...
मैं अपने मन और ..अपनी देह से हूँ .. कयों गैर
 कल्पनाओं के पंख आखिर ..
क्षितिज कों छूकर लौट आते हैं .
जब होने कों आती हैं..... रैन

 यथार्थ की पगडंडियों के चलते चलते रूक जाते हैं
अज्ञात यात्रा के  किसी न किसी छोर पर पैर
हर तारा यहाँ हैं अकेला
उस पर उसके केंद्र -बिंदु का ही हैं पहरा
लगता हैं मैं भी  कर रहा हूँ ......
एक अदृश्य पथिक सा
सूनी राहों के जंगल में ...
रूप बदल बदल कर ....बस सैर

 किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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