बुधवार, 12 दिसंबर 2012

236-इस निष्ठूर जग में



236-इस निष्ठूर जग में

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, November 16, 2011 at 7:09pm ·



प्यार से ...
पूछता है -साकार
 कब तक छलेंगे
तुम्हे
विभिन्न आकार
 तुम रहते हो मन में सबके
फिर भी लोग
करते नहीं तुम पर क्यों एतबार
 फूलो में रंग तुम्ही से है
बसंत के जंगल में
उन्मत से तुम ही खिले
बनकर अनेको पलाश
  पहाड़ का चीर हिरदय
शीतल जल लेकर गिरते
बन कर जल प्रपात
 मानव मन की घाटियों में
कुहरे सा छाये रहते
ओढ़कर शालीन महा -एकांत
 तुम
बूंद बूंद में
कण कण में
जन जन में
हो एकाकार
 
 फिर भी प्रतिस्पर्धाओं की होड़ में
अदृश्य हो गए
 क्यों प्यार ....?
 इस निष्ठूर जग में
तुम्हारे ....उदगार
किशोर कुमार खोरेन्द्र 


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