बुधवार, 12 दिसंबर 2012

230-ऊग आया इन्द्रधनुष हूँ



230-ऊग आया इन्द्रधनुष हूँ

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 6, 2011 at 9:38am ·



अपने मन में तुमने जो
लिख रखा हैं मेरा नाम
उसे कैसे मिटा पाओगी
वह धुंए की लकीर नहीं हैं
जिसे ओढ़ ले
बादलों सा ..यह आकाश

मैं तो आता ही रहूंगा
कभी कोहरा बनकर
लिये तुम तक मृदुल अहसास
कभी ओस बूंदों सा
बिछ जाउंगा तुम्हारे द्वार
जब भी पंखुरियों कों छुओगी
तुम्हारी हथेलियों पर
बिखर जाउंगा
बनकर कण पराग

मैं तुम्हारे मन की घाटियों में
ऊग आया इन्द्रधनुष हूँ
निहारा करो उसे
जब भी हो-
तुम्हारे ह्रदय के आँगन में
प्रेम की बरसात
किशोर




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