बुधवार, 12 दिसंबर 2012

221-निर्निमेष निहारते है



221-निर्निमेष निहारते है

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, October 29, 2011 at 1:09am ·



पेड़ की ओट ..
हो जाता हू
तब भी देख लेता है
मुझे सूर्य का अरुण

मुझे ढूंढ़ लेती है
सिंदूरी किरणे  हो ब्याकूल

अज्ञात की उंगलियों सा -
छू लेते है
झुकी  हुई  टहनियों के
सुकोमल नाखून

अपने आँचल में छिपाकर
संध्या ...
रख आती है
मन्दिर के द्वार मुझे अबुझ

न निगल पाता है मुझे तिमिर
न बुझा पाते है
समीर के बदलते रुख

निर्निमेष निहारते है
मुझे
आकाश के अनंत
चमकते प्रसून

संसार की नीरवता
सुनती है तब ....
मेरी लयबद्ध धडकनों को -
अपने अनुकूल ...
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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