बुधवार, 12 दिसंबर 2012

213-तुम मेरे लिये सच हो



213-तुम मेरे लिये सच हो

 

 

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 24, 2011 at 11:57pm ·

आज नहीं मिला तुमसे कोई ख़त
यदि नहीं था वक्त
तो एक कोरे कागज कों ही भेज देते
मैं लेता उसे पढ़
मन की बात कहने के लिये
वैसे भी
शब्द होते हैं असमर्थ

मैं तो तुम्हारे द्वारा प्रेषित पत्र में
तलाशता हूँ
तुम्हारी कोमल उँगलियों के स्पर्श
अक्षरों में तुम्हारी साँसों की सुगंध
और
अंत में लिखते लिखते एकाएक
तुम्हारी कलम जो ठहर गयी होती हैं
उस मौन का अर्थ

तुम्हारी अपनी एक दुनियाँ हैं
उसमे रहती हो तुम व्यस्त
फिर भी
न तोड़े ....
मुझे अपने दिल का हाल
बताने का ....यह क्रम

तुम मेरे लिये सच हो
न स्वप्न हो... न भ्रम

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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