शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

21-हरे रंगों के तोरणों से सजी डाल



21-हरे रंगों के तोरणों से सजी डाल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, January 11, 2011 at 6:49pm ·
हरे रंगों के तोरणों से सजी डाल
चलो मुझे तुमने किया तो याद
लगा मुझे तुमसे मिला हूँ
फिर एक बार बरसों बाद आज
 आषाढ़ का जल अब नहीं नदी के पास
पक कर खेतों में कटे पड़े हैं सुनहले धान
अमराई में कोयल हो गयी हैं जवान
आ रहा हैं बसंत ...
सुनकर वृक्षों की झुकने लगी हैं
हरे रंगों के तोरणों से सजी डाल
चलों तुम्हें आया तो सही
प्रिये ......मेरा ख्याल
अरहर हो या सरसों के पीले फूलों से
खेतों पर पूर गया हैं रंगोली ...माघ
बादल बना रहें खेल खेल में विभिन्न आकृतिया
खुले मैदान सा लग रहा हैं वृहत आकाश
दर्शक बनकर निहार रहें हैं
खिले हुए पलाश
ऐसे में पुन: तुम्हारा संदेशा आ जाए ..
.इसकी रहेगी मुझे आश



किशोर कुमार खोरेन्द्र




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