मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

203-एक प्रशन ..अनुत्तरित



203-एक प्रशन ..अनुत्तरित

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 17, 2011 at 2:09am ·



प्रेम से भरे
मेरे सरस इन शब्दों कों
तुम कर लेना अपने ह्रदय में अंकित
मेरी कविताओं के बिखरे पन्नों से
एक किताब बना लेना
कर उन्हें संकलित

जब भी तुम्हें मेरी याद आये
पढ़ लिया करना
प्रत्येक अक्षर हैं
इसके ..बूंद बूंद अमृत
सा एकत्रित

आरम्भ में जरूर हुआ था मैं
तुम्हारे बाह्य रूप पर मोहित
सिर्फ इसलिए
मेरी अवहेलना कर
कर ने देना मेरी भावनाओं कों
अपने प्यार से तुम वंचित

कभी सौन्दर्य तुम्हारा
सुनहरी रश्मियों सा
मुझ सागर में बरसा हैं
कभी मेरी प्यासी लहरों का मन
तुम्हें चाँद समझ कर
छूने कों तरसा हैं
पर तुम तटस्थ रहकर
अपनी ख़ामोशी से
कर गयी हो मुझे व्यथित

इस दुनियाँ की तरह ही
तुम भी रही प्रिये
एक प्रशन ..अनुत्तरित
और कोई नहीं
जिसके प्रति मैं
हो पाउँगा इतना आकर्षित

गीत तुम्हारे गाता
लौट रहा मैं एक पथिक
प्रेम से भरे
मेरे सरस इन शब्दों कों
तुम कर लेना अपने ह्रदय में अंकित

किशोर कुमार खोरेन्द्र 


कोई टिप्पणी नहीं: