गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

20-तुम्हारी दिव्य आत्मा मुझे सप्रेम कर ले वरण



20-तुम्हारी दिव्य आत्मा मुझे सप्रेम कर ले वरण

 

 

 

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, December 1, 2010 at 5:47pm ·मुझमे भर जाती हैं तुम्हारी  तस्वीर उमंग
अपने जुड़े में कसकर
बाँध लेना चाहते हैं तुम्हारी जुल्फें श्यामल
में मन्त्र मुग्ध हो कर घिर जाता हूँ
बिंदिया के लघु वृत्त में
करते ही उसका दर्शन
 भीतर तक भेद जाती हैं
मेरे मन कों तुम्हारी नजर
मैं तो चाहता हूँ स्वप्न में ही सही ....
बहुत करीब आ जाओं तुम ताकी
चूम लू तुम्हारे मिश्री से मधूर अधर

तुम्हारे ओंठों के ऊपर स्थित
तिल कहता है -....मुझसे 
सम्मोहित नहीं कर पाओगे
हमारे सौन्दर्य कों-
भूल जाओ तुम अपना वशीकरण

मैं ठगा सा रह जाता हूँ जब चल देती हो
बलखाती हुई सी
अपनी कमर

मुझे लगता हैं ........
तुम्हारे अंग अंग से छलकती हुई
खूबसूरती जितनी
किसी और में नहीं देख पाया हूँ मैं
अपने इस जनम
 लेकिन तुम अब यह मत लेना समझ
की मै तुम्हारे रूप का ही
दीवाना हूँ बस सनम
 मैं तो चाहता हूँ -
तुम्हारी देह के भीतर के
मन -आँगन को पार कर
तुम तक पहुँच जाऊ ताकी
मेरे द्वारा किये गए इस प्रशंसा से
तुम्हारी दिव्य आत्मा मुझे सप्रेम कर ले वरण
*किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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