गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

18-अनगिनत ,अनंत सितारें ....



18-अनगिनत ,अनंत सितारें ....

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, November 16, 2010 at 12:18pm ·

   
रेत पर पद-चिन्ह छोड़ जाओ
साथ उनके कुछ दूर चल लूंगा
 लहरों को अपना नाम -पता बता जाओ
इसी धरती में रहता हूँ तुम्हें ढूढ़ लूँगा
 छांव मे बैठी रह गयी हैं तुम्हारी परछाई
बैठ कर धूप सा तुम्हें निहार लूंगा
 अनगिनत ,अनंत , सितारें जड़े हैं 
तेरे आँचल में.....
जल बनकर उसे नदी सा बिछा लूँगा
तुम्हारे प्रतिबिम्ब को तुम मानकर
तुम्हें न देख पाने का दर्द भुला लूँगा

 मालूम हैं फूल बनकर तुम्ही खिली हो 
मंजिल हो मगर राह मे मेरे  ...
पगडंडियों सा तुम्ही आ मिली हो 
तुम्हारी बांहों के अदृश्य घेरे से घिरा हुआ होकर भी
तलाशता हूँ मै  ....
अपने प्रतिबिम्ब के सदृश्य
एक बिम्ब सा चेहरा ....तुम्हारा
किशोर कुमार खोरेन्द्र


कोई टिप्पणी नहीं: