सोमवार, 10 दिसंबर 2012

165-समीप जाओ तो



165-समीप जाओ तो

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, October 2, 2011 at 11:06am ·


दूर अंबर में
सुन्दर लगते हैं तारे
अच्छे लगते हैं
नदियाँ ,वन पर्वत सारे
जिनसे रिश्ता नहीं होता
वे अजनबी भी क्या इसीलिए
लगते हैं प्यारे

समीप जाओ तो
पौधों में
गुलाब से ज्यादा नजर आते हैं कांटें

इसलिए मैं चाहता हूँ
तुम मुझसे कभी न मिलो
विरह में
जुड़ जाया करते हैं
टूटे हुए प्रेम के महीन धागे

तुम मुझे सपनों में ही मिल लिया करों
ख्यालों में आ जाया करों
और मैं .....मन के पन्नों पर
लिखता रहूं ........
तुम्हारे लिये गाने
 किशोर कुमार खोरेन्द्र 



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