सोमवार, 10 दिसंबर 2012

164-एक दूसरे के लिये



164-एक दूसरे के लिये

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, October 2, 2011 at 6:25am ·



मैं स्वयं का कैसे करूँ मूल्यांकन
कुछ गुण और अवगुणों का
मैं हूँ एक संकलन

तुम्हें सौपता हूँ खुद कों .....
तुम अपनी उपस्थिति मात्र से
मेरे आचरण में कर दो कुछ संशोधन

तभी तो
तुम्हारे योग्य बन पाउँगा
मैं एक नूतन संस्करण

हालाँकि ........
व्यक्ति कोई किताब नहीं हैं
इसलिए मुमकिन नहीं हैं
इंसान का ठीक ठीक कर पाना आंकलन

किताबों में सच होता हैं
दंभ और झूठे अभिमान से
ग्रसित रहता हैं ......
आदमी के मन का अंत:करण

लेकिन ......
क्या पता प्यार में ऐसा भी होता हो सम्मोहन ..?
की
बन जाते हो नयन
एक दूसरे के लिये
सच्चे दर्पण

किशोर कुमार खोरेन्द्र 



1 टिप्पणी:

Nira ने कहा…

bahut sundar kavita likhi hai